सहज विरासत बचाओ

    संस्कृति,तहज़ीब,कला,भाषा और रिवाज़ जो इस देश को महानों में महान बनाता है उसकी विरासत थोड़ी आजकल ज्यादा कश्मकश में फसती नज़र आ रही है।

    खुद के सत्ता की लालच,धार्मिक समीकरण और जातिय उत्पीड़नता हर दफा विरासत को स्वर्णिम दिखने से रोकती है । अगर हम एक बार कभी पुरे भारत के दर्शन पर निकले तो इतनी परंपराऐं विकट होंगीं की हमारा खुद का मन इस बात को नहीं नकार सकेगा की इस देश में विविधताओं में विविधता हैं । भारतीय विरासत जो हमारे लिए एक अभिमान का पात्र है उसके स्वाभिमान से खेला जा रहा है जिसके फलस्वरूप हमें भारत अपनी पुरानी पृष्टभुमि से बिछड़ता दिख रहा है । जो धर्म के भ्रम और झुठे वादों की चाय हमें पड़ोसी जा रही है वो अभी तो नहीं पर निकटतम सालों में पाकिस्तान जैसा मरीज़ बनाके छोड़ेगी,जी हाँ ये वही चाय है जो जिन्ना ने पाकिस्तान को पिलाया था । 

    एक घुंट धर्म की चाय का

    भारत एक धार्मिक देश हैं यहां धर्म और आस्था एक संवेदनशील मुद्दा है,धर्म भारत में 20वीं सदी से ही राजनीति का एक पात्र बना ।भारत एक ऐसे तरह का धार्मिक देश बना जहाँ लोग धर्म के नाम पर बेफकुफ बन गए या आतंकवादी बन गए । और बन गए क्या बन रहे आज भी,जातिय उत्पीड़णता,दंगे फसाद ने हर बार साबित किया ये की हम बेवकुफ बन रहे हैं और तो और एक राज्य की आज़ादी के लिए हम धार्मिक कट्टरता के उधेड़बुण बन गए। खुद के धर्म को खतरे में पा कर आतंक का रास्ता ठान लिया । और निकल गए खुद के धार्मिक और आध्यात्मिक आज़ादी की लड़ाई में

    पर क्या कभी हम नें सोचा की भारत कैसे आज़ादी पाया ?

    आज़ादी गाधंवाद से आई नाकि धर्मवाद से,गांधी के इस देश ने जो परिभाषा लिखी उसे किसी इतिहास के पन्नों की आवश्यकता नही है । धर्म के इस खेल से हमें उठना होगा,और आगे बढ़ना होगा क्योंकि विश्व में ऐसा कोई देश नहीं है जो धर्म के आधार पर बढ़ा हो ।

    बदलते इतिहास,बदलती विरासत

    धार्मिक और आध्यात्मिक आज़ादी के लिए खुद के स्वार्थों को हमने दांव पे लगा तो रहे हैं पर हम बेखबर हैं की इस देश की दामन पर जो चोट लगी है और जो लगती रहेगी उन सब में हम खुद एक सच्चे हिंदु या मुस्लमान तो बन जाऐंगे पर भारतीयता का जो एक निष्ठा वाला धर्म है उससे मुकड़ने का खामियाज़ा भी आगे भुगतेंगें

    इतिहास के पाठ्यक्रम तो बदल देंगे पर इतिहास के उन पन्नों को कैसे बदलेंगें जो सिर्फ एक ही शब्द कहती है “हिदुंस्तान” जिसे सुनके 125 करोड़ वाले आबादी का देश विश्व में मानसिक दबाव बनाता है। हमें ये समझाया जाता है कि मुगलकालीन युग नें भारत की दुर्दशा बिगाड़ी पर हमें पता होना चाहिए की भारत का जो मापचित्र आज विश्वपटल पर मौजुद है वो मुगलों के दौड़ का ही भारत है अगर मुगल धार्मिक कट्टर होते तो अपने 350 साल के विशाल राज्य में इस्लाम का बोलाबाला कर देते,पुरा भारत इस्लामिक राष्ट्र होता पर तथ्य को देखें तो मुगलों के अधिकांश राजपाठ हिंदु अधिकारी चला रहे थे,उस दौड़ में न तो भीषण दंगे-फसाद होते थे न ही धार्मिक उन्मादियों के हौसले बुलंद थे। मुगल के अंतिम शासक ने 1857 में आज़ादी की पहली लड़ाई का नेतृत्व किया था और अंग्रेज़ी हुकमत के हज़ारों अवसरों को नकार कर रण में डटे रहे,उनका अंत काफी मार्मिक था क्योंकि ऐशो-आराम का जीवन त्याग रंगून में ज़लालत वाली ज़िदंगी व्यतीत करनी पड़ी

    सोमनाथ मंदिर का लुटेरा भी गज़नी से धर्म का विश पी कर नहीं आया था सत्ता का लोभ ही एक मुख्य कारण था जो उस समय के एक राजपुत राज को गज़नवी का सहयोग लेना पड़ा,गोरी,पृथ्वीराज चौहाण,खिलजी,औरंगज़ेब या शिवाजी कोई धार्मिक जंग नही लड़ रहे थे,सब अपने अस्तित्व और सत्ता बचाने के लिए मैदान में डटे हुए थे। पर दुख की बात ये है कि कुछ संस्था,कुछ संघ,कुछ पार्टीयाँ,कुछ शोघकर्ता हमेशा ये दावा करते आऐ की हिदुंत्तव खतरे में है,जी हाँ वही हिदुंत्तव जो तालिबान के इस्लाम की तरह है,जिसका सनातन जैसे गौरवशाली धर्म से कोई लेना-देना नहीं है ये सिर्फ एक एजंडा है सत्ता के शीशमहल को मुकम्मल करने का और भारत के पवित्र संविधान को दुषित करने का ।                   एक मुहिम चलाई जा रही है इस देश में की जनता भारतीय इतिहास को एक अलग चश्मे से देखे और धर्म के उन्माद का हिस्सा हो जाऐं,पर ऐसी शक्तियाँ करीब न जाने कितने दशकों से विफल होती आ रही है क्योंकि इस देश की आँखों पर आज भी वही गांधी वाला सत्य का चश्मा है,जिसने उन लोगों को चिन्हित किया था आज़ादी के उस लड़ाई में,वहो लोग है जो लड़ाई को एक धार्मिक रूप देकर अंग्रेज़ों के मंसुबो को कामयाबी देना चाहते थे पर दुर्भाग्यपुर्ण है की आज यहीं शक्तियाँ हमारे इस सहज और सजग विरासत वाले देश को वैश्विक,आर्थिक,सामाजिक रूप से विफल बना रही हैं और देश एकग्रता से चलाने की झुठी दुहाई दे रही हैं

    निर्णयाक क्षण

    धर्म के इस बदलते तेवर ये संदेश दे रहे हैं की अंदेशाएं कुशल नहीं हैं,गौरतलब ये भी है की देश में महंत,पीठ,मठ या फिर उलेमाओं की महफिलों ने धर्म को राजनीति का पात्र बनने से नहीं रोका और धर्म हमारी कार्यशैली,क्रियाशैली के अलावा हमारे सोचने,समझने का भी तर्क बन गया।धार्मिक असतुंलन ने जो असहिष्नुता का आग इस देश मे फैलाया है उसमे जलने वाले अधिकांश गरीब होते है। पर शर्म की बात है सत्तर साल की आज़ादी के बाद न जाने कौन से बंदिशों में हम आज भी बंधे हुऐ है की विरासत सभांलने के बजाय हम नफरत की नई रियासत ढाल रहे हैं ।

    पर क्या जो सियासत जो आज इस देश पर हावी है क्या वो सुनिश्चित कर सकता हैं कि विरासत,संस्कृति,रीति-रिवाज़,इतिहास बदलने के बाद इस देश की मानसिक,सामाजिक,आर्थिक गरीबी की दशा और दिशा बदल देंगे,या उन गरीबों को न जलाकर उनकी गरीबीं जला देगें। क्या “जय श्रीराम” चिल्ला कर या “अल्लाह हु अकबर” रट कर या “वीर शिवाजी” या मुगल गजनवी करके किसी को रोटी मिल सकती है ? कभी नही मिल सकती,रोटियाँ सिर्फ सिक सकती है इनके आँच पर ।जो भी भारतीय ऐतिहासिक घटनाऐं हुई वो हमारी विरासत है उससे छेड़छाड़ नीचता का प्रमाण है।

    इतिहास और विरासत इंसान सिर्फ क्षण भड़ के लिए बदल सकता है क्योंकि उनका प्रभाव लंबा और गहरा होता है

    Author: Sibte Hassan

    Socialist

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